निष्काम कर्मयोग क्या है?

निष्काम कर्मयोग क्या है?

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग(nishkaam karmyog) करने के लिए क हते हैं। भगवान कहते हैं कि-

पार्थ जय पराजय और लाभ हानि सुख दुःख को करले स्वीकार आज तू समान भाव से,
रण अलभ्य लाभ इससे वीर को वंचित रख तन सचित होने दे रण प्रदत्त भाव से,
शस्त्र है खिलौने युद्ध भूमि खेल का आँगन, क्षत्रिय तो होते हैं युद्ध प्रिय स्वभाव से,
होकर कटिबद्ध धर्म युद्ध हेतु प्रस्तुत हो, यूँ तू बच जायेगा पाप के प्रभाव से।
इस प्रकार सुख दुःख , लाभ-हानि, जय पराजय, अथवा हार-जीत को एक सामान समझकर केवल इसलिए युद्ध करो क्योंकि इस समय युद्ध करना तेरा कर्तव्य है और यदि इस मानसिक वृत्ति से इसे अपना धर्म समझकर युद्ध करोगे तो तुम्हें इसका पाप नहीं लगेगा।

अर्जुन पूछते हैं– ये क्या कह रहे हो केशव! कि युद्ध करके पाप नहीं लगेगा? युद्ध में तो इतनी हिंसा होगी, लाखों प्राणियों की हत्या होगी, फिर मनुष्य उसके पाप से कैसे बचेगा।

कृष्ण कहते हैं – यदि कोई भी कार्य निष्काम कर्मयोग की रीत से किया जाये तो न उसका पाप लगता है और न उसका पुण्य मिलता है।

अर्जुन पूछते हैंनिष्काम कर्मयोग कौनसा योग है माधव? जो मनुष्य को पाप और पुण्य दोनों से मुक्त कर देता है।

कृष्ण कहते हैं – ये एक गूढ़ विद्या है पार्थ! जो इसके रहस्य को समझ लेता है वो इस संसार में रहते हुए भी, संसार के सारे कर्म करता हुआ भी, कर्मफल के बंधन से मुक्त रहता है।

अर्जुन पूछता है– ये बड़ी अनोखी बात कर रहे हो केशव। मेरी बुद्धि अभी तक इसको ग्रहण नहीं कर रही।

कृष्ण बोले– क्योंकि तुम्हारी बुद्धि पर अभी तक आशक्ति का पर्दा पड़ा हुआ है और जो निष्काम कर्मयोग मैं बता रहा हूँ उसकी बुनियाद ही निराशक्ति के आधार पर रखी हुई है। हे अर्जुन! इस निराशक्ति योग को समझ लोगे तो तुम्हारे जीवन पूर्ण शांति आ जाएगी।

अर्जुन पूछता हैं–  निष्काम कर्मयोग की साधना कैसे करते हैं? इस योग के नियम क्या हैं?

कृष्ण बताते हैं – उसकी साधना के लिए कोई हजारों वर्षों की तपस्या की आवश्यकता नहीं। इसकी साधना तो एक ही क्षण में हो जाती है।

अर्जुन पूछता है- एक ही क्षण में?

कृष्ण कहते हैं– हाँ! जिस क्षण में प्राणी अपने मन का रवैया बदल लेता है वही क्षण।

अर्जुन फिर पूछते हैं- परन्तु हे केशव! कोई भी मनुष्य एक ही क्षण में आशक्ति को कैसे छोड़ सकता है? जब वो कर्म करता है तो उसके फल की आशक्ति तो उसके कर्म का हिस्सा होती है, जिसके अंतर्गत फल पाने की इच्छा से ही कर्म करता है।

कृष्ण बताते हैं- हे अर्जुन! बस यहीं से निष्काम कर्मयोग की साधना शुरू होती है।

अर्जुन कहता है- अर्थात?

कृष्ण बोले- अर्थात तुमने कहा कि प्राणी फल पाने की इच्छा से ही कर्म करता है परन्तु निष्काम कर्म योग ये सिखाता है कि फल पाने की इच्छा से नहीं बल्कि अपने कर्तव्य पूरा करने के लिए, अपने धर्म का पालन करने के लिए कर्म करो। फल पर भरोसा रखकर कर्म मत करो। क्योंकि फल पाना तुम्हारे हाथ में नहीं। तुम्हारे अधिकार में केवल कर्म करना ही है।

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